Grimm Bandhuon Ki Kahaniyan

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MRP.125 Rs. 63
  • Availability : In Stock
  • Author Name : Harikrishan Devsare
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  • Book condition : Good condition preloved book

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About book :तुडविग कार्ल ग्रिम (1765-1863) और विलहेम कार्ल ग्रिम (1786-1859) आधुनिक आख्यान-शास्त्र एवं सोक-साहित्य-विज्ञान के जनक और भाषा-विज्ञानी थे। उनका मुख्य उद्देश्य साहित्य के पारम्परिक स्वर एवं स्वरूप का अध्यापन करना था। जैकोब को जर्मन भाषा और व्याकरण के प्रति रुचि थी तो विलहेम को लोककथाएँ संगृहित करने में विशेष आनंद मिलता था। इन कहानियों के संकलन का उद्देश्य परंपरागत कहानियों के विपुल समुच्चय को समेटते हुए भाषा, मुहावरों, दंतकथाओं कविताओं, बालसुलभ खेलो और गीतों के माध्यम से जर्मन भाषा एवं संस्कृति के स्रोतों और ऐतिह्य का क्रमिक विकास के साथ अध्ययन करना था ।  ग्रिम बंधुओं ने जर्मनी के चप्पे-चप्पे पहुँचकर बुजुर्गो और किस्सागो  से कहानियों सुनकर लिपिबद्ध की । ये वही कहानियों थीं, जिन्हें लोग सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनते-सुनाते रहे थे। किसान, मजदूर, दादी, नानी जैसे विभिन्न स्रोतों से ग्रिम बधुजों ने ये कहानियों सुनकर इकट्ठा की। ग्रिम बंधुओं का वृहद कया संकलन (1812) नर्सरी एण्ड हाउसहोल्ड टेल्स (नर्सरी और घरेलू कहानियाँ) छपते ही जर्मनी के घर-पर की जरूरत बन गया। कहानियों का दूसरा खण्ड  1815 में प्रकाशित हुआ। ग्रिम बंधुओं को 1829 में गार्टिगेन यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर और पुस्तकाध्यक्ष बनाया गया और वे 1841 में बर्तिन विश्वविद्यालय में 'एकेडमी ऑफ साइन्सेस' के लिए चुने गये। ग्रिम बंधुओं की कहानियाँ केवल जर्मन साहित्य ही नहीं, बल्कि विश्व बाल साहित्य की अमर धरोहर हैं तमाम दुनिया के बाल पाठक इन्हें पढ़ते आ रहे हैं और कोई दो सौ वर्षों से ये बच्चों के साथ-साथ बड़ों का भी मनोरंजन कर रही हैं। इन कहानियों को बच्चों ने जिस उत्साह से स्वीकार किया उसका सीधा और सुखद परिणाम यह हुआ कि उनकी कल्पनाजन्य लालसा को मिटाने की जरूरत पर अन्य लेखकों और बुद्धिजीवियों का ध्यान गया। यूरोप में ग्रिम बंधुओं की कहानियों की लोकप्रियता से उनके अनुवाद में तेजी आई और इनके अनुवाद क्रमशः डेनिश, स्विस एवं फ्रांसीसी और फिर अंग्रेजी, इतालवी, स्पानी, चेक और पोलिश भाषाओं में हुए। 

Product detail

  • Author ‏: Harikriahna Devsare
  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • ISBN : 978-81-260-2040-7
  • Publisher : Sahitya Akademi
  • paperback : 218 Pages

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