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About Book : "अंग्रेजों की जड़ें हिल चुकी हैं। वे पन्द्रह साल में चले जाएँगे, समझौता हो जाएगा। पर उससे जनता को को लाभ नहीं होगा। काफी साल अफरा-तफरी में बीतेंगे। उसके बाद लोगों को मेरी याद आएगी।"
फांसी दिए जाने से कुछ ही दिन पहले कहे गए भगतसिंह के ये शब्द आज अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रहे है। बाकी बहुत सी बातों को अगर किनारे कर भी दिया जाए तो आने वाली पीड़ियों के समक्ष ये सवाल शायद हमेशा ही अनुतरित रहेंगे कि भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व लुटा देने वाले जांबाजों को आजाद भारत के शासकों ने अहिंसावाद के मुकाबले अप्रचारित क्यों रखा, शोर्य को दोयम क्यों माना, शहादल के अर्थ क्यों बदल गए।
भगतसिंह की पारिवारिक स्थिति, जन्म और कार्यकलाप पर इससे पहले अनेक पुस्तकें आ चुकी हैं। परन्तु हंसराज रहकर पहले लेखक हैं जिन्होंने भगतसिंह : एक ज्वलंत इतिहास में उनके पारिवारिक संस्कार, तत्कालीन राजनीति में प्रचलित विभिन्न विचारधाराओं और कार्यशैलियों तथा भगतसिंह के परिवेश, अध्ययन, चिन्तन-मनन और उससे उत्पन्न उनके अपने दर्शन की व्याख्या की है। इस पुस्तक के माध्यम से से हमें पता चलता है कि भगतसिंह का अभियान अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश करने और स्वराज पा लेने तक सीमित नहीं था; वे भारत में वैचारिक क्रांति के सूत्रधार थे और बड़े योजनाबद्ध तरीके से उस ओर कार्यरत थे वे भारत में अंग्रेज सरकार के नहीं बल्कि हर प्रकार के सामन्तवाद और दमन के खिलाफ थे। यही कारण या कि कांग्रेस आदि दल जब स्वराज प्राप्ति यानी सत्ता के हस्तांतरण के लिए लड़ रहे थे. भगतसिंह और उनका दल तब समाजवाद और प्रजातन्त्र का उद्घोष कर रहे थे।
About Author : हंसराज रहबर ने अपनी अन्तिम सांस तक भगतसिंह को एक व्यक्ति, एक क्रांतिकारी या एक शहीद से कहीं ऊपर एक विचारक माना। ऐसा विचारक जिसने भारत के राजनीतिक चिन्तन में गुणात्मक परिवर्तन प्रस्तुत किया। भगतसिंह की जीवनी के बहाने यह पुस्तक दरअसल, भगतसिंह विचारधारा और दर्शन का व्याख्यात्मक दस्तावेज है पिटे हुए लोगों से अहिंसा का कीर्तन कराना और शूरों के नाम-काम को आगामी पीढ़ी से दूर रखना-इस व्यवस्था का यह अंग्रेज-चरित्र है। यह जब तक रहेगा, पूर्ण-स्वतंत्रता हमसे कोसों दूर रहेगी। भारतीय राजनीति के पल-पल बदलते और तथाकथित रूप से अधोगामी होते जा रहे चरित्र को संभालने के लिए इसे समझना और अपनाना आज अनिवार्य रूप से जरूरी हो गया है।
Product details
- Language : Hindi
- Author Name : Hansraj Rehbar
- Publisher : Bhagat singh vichar manch
- Paperback : 195 pages
- ISBN : 81-86265-20-1
